महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं। Mahashivratri wishes

इस ब्लॉग में 10 सबसे बढ़िया महाशिवरात्रि शुभकामनाएँ: इस महाशिवरात्रि, आपके जीवन का हर अंधकार शिव के प्रकाश से मिटे और हर कठिनाई नीलकंठ की तरह सहज हो जाए। On this Mahashivratri, may every darkness in your life be dispelled by Shiva’s light, and may every difficulty become as effortless as it is for Neelkanth. भोलेनाथ की जटाओं से बहती गंगा की निर्मल धारा आपके विचारों को शुद्ध करे और आपके कर्मों को दिव्यता प्रदान करे। May the pure stream of Ganga flowing from Bholenath’s matted locks purify your thoughts and infuse divinity into your actions. महाशिवरात्रि की रात, जब शिव ने विष को अपने कंठ में रोककर संसार को बचाया, उसी तरह वे आपके जीवन की हर विषमता को भी अपने आशीर्वाद से रोक दें। On this Mahashivratri night, just as Shiva held the poison in his throat to save the world, may He halt every adversity in your life with His blessings. शिव-पार्वती के मिलन की पावन स्मृति आपके परिवार में प्रेम, एकता और शक्ति का संचार करे। May the sacred memory of Shiva and Parvati’s union infuse your family with love, unity, and strength. महाशिवरात्रि का जागरण केवल रातभर का नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण का अवसर है-आपके भीतर का शिव जागे और आपको अनंत शांति दे। The vigil of Mahashivratri is not just for one night-it’s an opportunity for the soul’s awakening. May the Shiva within you awaken and grant you eternal peace.

2026 महाशिवरात्रि कब है। Mahashivratri Kab Hai

महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह आत्मिक जागरण, अनुशासन और शिव की कृपा प्राप्त करने का अवसर है। उपवास, रुद्राभिषेक, जागरण और मंत्रजप से भक्त अपने भीतर की नकारात्मकता को दूर कर दिव्य चेतना से जुड़ते हैं। महाशिवरात्रि क्यों मनाया जाता है? महाशिवरात्रि को मनाने के पीछे कई धार्मिक और आध्यात्मिक कारण हैं: शिव-पार्वती विवाह: इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसे शिव-शक्ति के मिलन का प्रतीक माना जाता है। शिवलिंग प्रकट होना: मान्यता है कि इसी रात भगवान शिव ने लिंग रूप में प्रकट होकर अपनी अनंत शक्ति का दर्शन कराया। तांडव नृत्य: महाशिवरात्रि को भगवान शिव के तांडव नृत्य की रात भी कहा जाता है, जो सृष्टि के सृजन, पालन और संहार का प्रतीक है। महाशिवरात्रि को “The Great Night of Shiva” कहा जाता है, जो आत्मचिंतन, ध्यान और अज्ञान के नाश का प्रतीक है। इस रात जागरण और मंत्रजप से आत्मा को शुद्ध करने का अवसर मिलता है। अंधकार पर विजय: महाशिवरात्रि पर्व आंतरिक अंधकार (अज्ञान, नकारात्मकता) पर विजय और प्रकाश (ज्ञान, चेतना) की प्राप्ति का प्रतीक है। महाशिवरात्रि 2026 रविवार, 15 फरवरी को मनाई जाएगी। महाशिवरात्रि से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ हैं, जो इसके महत्व को और गहराई से समझाती हैं: प्रमुख पौराणिक कथाएँ समुद्र मंथन और विषपान देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया। मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला, जो संपूर्ण सृष्टि को नष्ट कर सकता था। भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए वह विष पी लिया और उसे अपने कंठ में रोक लिया।इसी कारण उनका नाम नीलकंठ पड़ा। महाशिवरात्रि को इस घटना की स्मृति में भी मनाया जाता है। शिव-पार्वती विवाह माता पार्वती ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया। महाशिवरात्रि की रात उनका विवाह हुआ।इस कारण यह दिन शिव-शक्ति के मिलन का प्रतीक है। शिवलिंग का प्रकट होना एक कथा के अनुसार, ब्रह्मा और विष्णु में श्रेष्ठता का विवाद हुआ। तभी भगवान शिव ने अनंत ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट होकर बताया कि वे ही आदि और अनंत हैं। महाशिवरात्रि को इस दिव्य प्रकट होने की स्मृति में भी मनाया जाता है। शिव का तांडव मान्यता है कि महाशिवरात्रि की रात भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया। यह नृत्य सृष्टि के सृजन, पालन और संहार का प्रतीक है। महाशिवरात्रि तिथि विवरण: चतुर्दशी तिथि (कृष्ण पक्ष, फाल्गुन मास) 15 फरवरी शाम 5:04 बजे से शुरू होकर 16 फरवरी शाम 5:34 बजे तक रहेगी। महाशिवरात्रि मुख्य पूजा: चूंकि महाशिवरात्रि की पूजा निशीथ काल (मध्यरात्रि) में होती है, इसलिए प्रमुख अनुष्ठान 15 फरवरी की रात को किए जाएंगे। महाशिवरात्रि निशीथ काल मुहूर्त: 16 फरवरी की रात 12:09 AM से 12:59 AM तक सबसे शुभ समय माना गया है। चतुर्दशी तिथि: 15 फरवरी शाम 5:04 PM से 16 फरवरी शाम 5:34 PM तक महाशिवरात्रि 2026 के चार प्रहर पूजा मुहूर्त हैं: महाशिवरात्रि पूजा प्रहर समय (15–16 फरवरी 2026) प्रहर समय पहला प्रहर 15 फरवरी रात 6:09 PM – 9:19 PM दूसरा प्रहर 15 फरवरी रात 9:19 PM – 12:29 AM तीसरा प्रहर 16 फरवरी रात 12:29 AM – 3:39 AM चौथा प्रहर 16 फरवरी सुबह 3:39 AM – 6:49 AM भगवान शिव भक्तजन इन चारों प्रहरों में शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, और भस्म अर्पित करते हैं। प्रत्येक प्रहर की पूजा का महत्व अलग होता है और इसे क्रमबद्ध तरीके से करना श्रेष्ठ माना जाता है। महाशिवरात्रि 2026 की पूजा विधि: व्रत नियम: दिनभर उपवास रखें, केवल फलाहार या जल ग्रहण करें।ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन को शिव ध्यान में लगाएँ।स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और शिवलिंग की पूजा करें। पूजा विधि (चार प्रहरों में) प्रहर अर्पण मंत्र पहला प्रहर (6:09 PM – 9:19 PM) जल, बेलपत्र “ॐ नमः शिवाय” दूसरा प्रहर (9:19 PM – 12:29 AM) दूध, दही “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे…” तीसरा प्रहर (12:29 AM – 3:39 AM) घी, शहद “ॐ नमः शिवाय” चौथा प्रहर (3:39 AM – 6:49 AM) चंदन, भस्म, धतूरा “ॐ नमः शिवाय” महाशिवरात्रि विशेष अनुष्ठान: निशीथ काल पूजा (12:09 AM – 12:59 AM): यह सबसे महत्वपूर्ण समय है। शिवलिंग पर जलाभिषेक और पंचामृत अर्पण करें। रुद्राभिषेक: यदि संभव हो तो रुद्राभिषेक करें, जिसमें जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक होता है। जागरन: रातभर शिव कथा, भजन और मंत्रजप करें। महत्वमहाशिवरात्रि का व्रत करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, पापों का क्षय होता है और शिव कृपा प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि 2026 की पूजा सामग्री सूची और उनके उपयोग: सामग्री उपयोग जल (गंगाजल श्रेष्ठ) शिवलिंग पर अभिषेक के लिए दूध पंचामृत में और अभिषेक हेतु दही पंचामृत में घी पंचामृत में और दीपक जलाने हेतु शहद पंचामृत में बेलपत्र (तीन पत्तियों वाला) शिवलिंग पर अर्पण, शिव को अत्यंत प्रिय धतूरा शिवलिंग पर चढ़ाना भस्म शिवलिंग पर अर्पण और स्वयं पर तिलक चंदन शिवलिंग पर लेप अक्षत (चावल) पूजा में अर्पण फल नैवेद्य के रूप में धूप, दीप आरती और पूजन में फूल (विशेषकर सफेद) शिवलिंग पर अर्पण रुद्राक्ष माला मंत्रजप के लिए शुद्ध वस्त्र पूजा के समय धारण करने हेतु सामग्री का उपयोग क्रम: इस प्रकार सामग्री का क्रमबद्ध उपयोग करने से पूजा पूर्ण और फलदायी मानी जाती है।

गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है? जानिए इसका महत्व, इतिहास और आधुनिक संदर्भ | Guru Purnima Significance

Guru Purnima Significance: गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक पावन पर्व है, जो हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह दिन गुरु-शिष्य परंपरा को सम्मान देने और जीवन में गुरु के योगदान को याद करने के लिए समर्पित है। वर्ष 2026 में गुरु पूर्णिमा 26 जुलाई, गुरुवार को मनाई जाएगी। गुरु पूर्णिमा का महत्व क्या है? जानिए इस पावन पर्व का इतिहास, धार्मिक मान्यताएँ और आज के युग में गुरु की भूमिका विस्तार से। गुरु पूर्णिमा का महत्व | Guru Purnima Significance: गुरु का स्थान: हिंदू धर्म में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूज्य माना गया है। ज्ञान और मार्गदर्शन: गुरु को अंधकार दूर करने वाला और ज्ञान का प्रकाश देने वाला बताया गया है। धार्मिक मान्यता: हिंदू धर्म: गुरु को ईश्वर के समकक्ष माना जाता है। बौद्ध धर्म: इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपने पाँच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। जैन धर्म: इस दिन महावीर स्वामी के प्रथम शिष्य गौतम स्वामी को दीक्षा मिली थी। गुरु पूर्णिमा क्यों मनाते हैं गुरु पूर्णिमा 2025 गुरु पूर्णिमा का इतिहास गुरु पूर्णिमा का महत्व: गुरु के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करना। समाज में शिक्षा और मार्गदर्शन की परंपरा को जीवित रखना। विद्यार्थियों को गुरु के महत्व का बोध कराना। गुरु शिष्य परंपराएँ और उत्सव: शिष्यों द्वारा अपने गुरु को पूजा और सम्मान अर्पित किया जाता है। मंदिरों और आश्रमों में विशेष कार्यक्रम आयोजित होते हैं। विद्यालयों में छात्र गुरु पूर्णिमा पर भाषण और सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं।

जानें कैसे पीएम मोदी ने हर साल सैनिकों के साथ मनाई दिवाली | Prime minister Narendra Modi Deewali With Indian Army

Narendra Modi Deewali | प्रत्येक वर्ष की तरह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर इस साल दिवाली का त्यौहार भारतीय सशस्त्र बलों के जवानों के साथ मनाकर वर्ष २०१४ से अपनी परंपरा को जारी रखा है। इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीपावली त्योहार गोवा और कर्नाटक के तटों के पास, भारत के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर भारतीय नौसेना के जवानों के बीच मनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश के सबसे दुर्गम इलाकों(सियाचिन की बर्फीली ऊंचाइयों से लेकर जैसलमेर के रेगिस्तान तक) में तैनात सैनिकों से मिलना और उनके बीच दीपावली त्यौहार मनाना एकता और सामर्थ्य का प्रतीक बन गया है। आइए एक नजर डालते हैं पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गयी इस विशेष परंपरा पर: वर्ष दर वर्ष: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सैन्य दिवाली | Narendra Modi Deewali With Army 2023 (हिमाचल प्रदेश): हिमाचल प्रदेश के लेप्चा में सेना के जवानों के साथ दीपावली का त्यौहार(Narendra Modi Deepawali) मनाया साथ ही उन सैनिकों को संबोधित किया। सूडान से भारतीय नागरिकों की सफल निकासी और तुर्की में भारतीय सैनिकों द्वारा भूकंप राहत जैसे मानवीय अभियानों में सेना की भूमिका को सराहा। 2022 (कारगिल, लद्दाख): कश्मीर के दुर्गम इलाकों में से एक कारगिल की वीर भूमि पर सैनिकों के साथ दिवाली मनाई थी । दुश्मन देश पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना का युद्ध में कारगिल की विजय गाथा को याद किया और इस क्षेत्र ने उन पर छोड़े गए गहरे प्रभाव की बात कही। 2021 (नौशेरा, जम्मू-कश्मीर): भारतीय सेना का नौशेरा की वीरता को भारतीय साहस का प्रतीक बताया। ब्रिगेडियर उस्मान और नायक जदुनाथ सिंह जैसे वीरों को श्रद्धांजलि दी और सर्जिकल स्ट्राइक में शामिल ब्रिगेड की सराहना की। 2020 (लोंगेवाला, राजस्थान): राजस्थान के जैसलमेर स्थित लोंगेवाला पोस्ट पर सैनिकों के साथ त्योहार मनाया। 1971 के पाकिस्तान युद्ध में यहां हुई ऐतिहासिक लड़ाई को भारतीय सेना की रणनीति और बहादुरी की मिसाल बताया। 2019 (राजौरी, जम्मू-कश्मीर): कश्मीर में एलओसी पर तैनात जवानों के साथ दिवाली मनाई। कश्मीर के राजौरी के ‘हॉल ऑफ फेम’ को भारतीय सेना का ‘पराक्रम भूमि’ बताया और बाद में पठानकोट एयरबेस पर वायु सैनिकों से मिले। 2018 (उत्तरकाशी, उत्तराखंड): चीन सीमा पर तैनात सेना और इंडो-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवानों के बीच त्योहार मनाया और उनका हौसला बढ़ाया। 2017 (बांदीपोरा, जम्मू-कश्मीर): बीएसएफ और सेना के जवानों के साथ दिवाली मनाई। इस दौरान पाकिस्तान को आतंकवाद का समर्थन बंद करने के लिए एक स्पष्ट चेतावनी दी। 2016 (हिमाचल प्रदेश): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आर्मी और डोगरा स्काउट्स के जवानों से मिले। इस मुलाकात ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एक सैनिक के बीच दोस्ताना रिश्ते की एक झलक दिखाई। 2015 (पंजाब): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पंजाब में सैनिकों के बीच दिवाली मनाई और 1965 के युद्ध स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की। 2014 (सियाचिन ग्लेशियर): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनने के बाद अपनी पहली दिवाली दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र, सियाचिन में बिताई, जहाँ तापमान -40° डिग्री तक पहुँच जाता है। इससे उनकी इस विशेष परंपरा की शुरुआत हुई। इस वर्ष, प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के खिलाफ मौजूदा खतरों के मद्देनजर नौसेना की सतर्कता और रणनीतिक कच्छ तटीय रेखा की सुरक्षा में उसकी भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने सर क्रीक को भारत की एकता का प्रतीक बताया और 1971 के युद्ध में दुश्मन को मिले करारे जवाब को याद किया।

सावन का धार्मिक महत्व | Sawan Kab Se Hai

sawan kab se hai : सावन जिसे श्रावण मास भी कहा जाता है, हिंदू पंचांग का पाँचवाँ महीना है और भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ पूर्णिमा 10 जुलाई को मनाई जाएगी। इसके अगले दिन यानी 11 जुलाई से सावन के महीने की शुरुआत(sawan kab se lagega) होगी और सावन 9 अगस्त 2025 तक(sawan kab lagega) रहेगा। सावन का पहला सोमवार कब है? |savan ka pahla somwar kab hai सावन का पहला सोमवार 14 जुलाई को है। इस दिन से सावन का महीना शुरू हो रहा है और इसी दिन से 16 सोमवार व्रत की शुरुआत भी की जा सकती है. सावन का पहला सोमवार: 14 जुलाई, 2025 को है. सावन का महीना: 11 जुलाई से 9 अगस्त तक रहेगा. 16 सोमवार व्रत: 14 जुलाई से शुरू किया जा सकता है. सावन में सोमवार का महत्व: सावन के सोमवार का व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए रखा जाता है. सावन 2025 की तिथियाँ | Sawan Kab Se Hai: प्रारंभ(): 11 जुलाई 2025 समापन: 9 अगस्त 2025 सावन सोमवार व्रत: 14 जुलाई21 जुलाई28 जुलाई4 अगस्त sawan ka last somwar kab hai/sawan ka akhri somwar kab hai: 4 अगस्त सावन का धार्मिक महत्व: समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने ग्रहण किया था, जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए. इस मास में शिवलिंग पर जलाभिषेक करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है. माता पार्वती ने इसी महीने में शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था. सावन में पूजा विधि: सावन में क्या न करें: सावन की शिवरात्रि कब है?|sawan ki shivratri kab hai? सावन की शिवरात्रि 23 जुलाई, 2025 (बुधवार) को मनाई जाएगी। सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 23 जुलाई को सुबह 04:39 बजे से शुरू होगी और 24 जुलाई को सुबह 02:28 बजे समाप्त होगी। चूंकि निशिता काल (अर्धरात्रि का समय) 23 जुलाई को ही पड़ रहा है, इसलिए सावन शिवरात्रि 23 जुलाई को मनाई जाएगी। सावन के प्रमुख शिव मंत्र और उनके अर्थ क्या हैं? सावन के प्रमुख शिव मंत्र और उनके अर्थ इस पवित्र महीने में भगवान शिव की कृपा पाने के लिए मंत्रों का जाप अत्यंत फलदायी माना जाता है। यहाँ कुछ शक्तिशाली शिव मंत्र दिए गए हैं, साथ में उनके सरल अर्थ भी: ॐ नमः शिवाय मंत्र अर्थ: “मैं शिव को नमन करता हूँ।” यह पंचाक्षरी मंत्र आत्मा की शुद्धि करता है और शिव से जुड़ने का सबसे सरल माध्यम है। महामृत्युंजय मंत्र ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ अर्थ: “हम उस त्रिनेत्रधारी शिव की उपासना करते हैं जो सुगंधित हैं और पोषण देने वाले हैं। जैसे खीरा बेल से अलग होता है, वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें।” यह मंत्र रोग, भय और अकाल मृत्यु से रक्षा करता है। शिव गायत्री मंत्र ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ अर्थ: “हम शिव को जानें, महादेव का ध्यान करें, और रुद्र हमें प्रेरणा दें।” यह मंत्र शिवतत्त्व की प्राप्ति में सहायक है। ॐ नमो भगवते रूद्राय अर्थ: “मैं भगवान रूद्र को नमन करता हूँ।” यह रूद्र रूप की आराधना के लिए उपयुक्त है, जो शिव का उग्र स्वरूप है। धन प्राप्ति मंत्र ॐ ह्रौं शिवाय शिवपराय फट्॥ अर्थ: “हे शिव! मुझे धन, समृद्धि और सुरक्षा प्रदान करें।” यह मंत्र विशेष रूप से आर्थिक उन्नति के लिए उपयोग किया जाता है। सावन में शिव पूजा के अन्य प्रमुख रीति-रिवाज क्या हैं? सावन में शिव पूजा के प्रमुख रीति-रिवाज भक्तों द्वारा इस पवित्र महीने में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अनेक पारंपरिक विधियाँ अपनाई जाती हैं। यहाँ कुछ विशेष रीति-रिवाज दिए गए हैं जो सावन में आमतौर पर पालन किए जाते हैं: पूजा की विशेष विधियाँ जलाभिषेक: गंगाजल या शुद्ध जल से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। सोमवार को यह विशेष रूप से शुभ माना जाता है। पंचामृत स्नान: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से शिवलिंग को स्नान कराना अत्यंत पुण्यकारी होता है। बेलपत्र अर्पण: त्रिपत्री बेलपत्र शिव को अत्यंत प्रिय हैं। इन्हें उल्टा नहीं चढ़ाना चाहिए। धतूरा, भांग और आक के फूल: ये सभी वस्तुएँ भगवान शिव को प्रिय हैं और सावन में विशेष रूप से अर्पित की जाती हैं। दीप और धूप जलाना: पूजा स्थल पर गाय के घी या तिल के तेल से दीपक जलाना शुभ माना जाता है। मंत्र जाप और पाठ ॐ नमः शिवाय और महामृत्युंजय मंत्र का जाप कम से कम 108 बार करें। शिव चालीसा, रुद्राष्टकम या शिव पुराण का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है। व्रत और उपवास सावन सोमवार व्रत: हर सोमवार को उपवास रखकर शिव की विशेष पूजा की जाती है। मंगला गौरी व्रत: विवाहित महिलाएँ मंगलवार को यह व्रत रखती हैं, विशेष रूप से सौभाग्य की प्राप्ति के लिए। अन्य धार्मिक गतिविधियाँ शिव पूजा के लिए प्रमुख व्रत कथाएँ क्या हैं? शिव पूजा के लिए प्रमुख व्रत कथाएँ भक्तों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए व्रत कथाएँ सुनना अत्यंत शुभ माना जाता है। यहाँ कुछ प्रसिद्ध व्रत कथाएँ दी गई हैं जो सावन और शिव पूजा के दौरान विशेष रूप से पढ़ी या सुनी जाती हैं: शिव पूजा से जुड़े अन्य प्रमुख व्रत और त्योहार कौन से हैं? शिव पूजा से जुड़े प्रमुख व्रत और त्योहार हिंदू धर्म में भगवान शिव की आराधना के लिए कई विशेष व्रत और पर्व मनाए जाते हैं, जो भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति, सुख-शांति और मोक्ष की ओर ले जाते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख व्रत और त्योहारों की सूची दी गई है: प्रमुख त्योहार

Festival and Celebrations in July 2025 | Important Days in July 2025

Important Days in July 2025 : 1 July International Joke Day 1 July National Doctor Day India 1 July Van Mahotsav 1 July National Postal Worker Day 1 July Canada Day 1 July Chartered Accountants Day (India) 1 July National U.S. Postage Stamp Day 1 July National Gingersnap Day 2 July World UFO Day 2 July National Anisette Day 3 July National Fried Clam Day 3 July St Thomas Day 4 July Independence Day USA 6 July World Zoonoses Day 5 July Dree Festival 6 July International Kissing Day 6 July Ashura 6 July Devshayani Ekadashi 7 July World Chocolate Day 7 July Global Forgiveness Day 7 July Jagannath Puri Rath Yatra 9 July National Sugar Cookie Day 10 July Guru Purnima 11 July World Population Day 11 July Kanwar Yatra 11 July National 7-Eleven Day 12 July Paper Bag Day 12 July Malala Day 12 July National Simplicity Day 14 July Bastille Day or French National Day 15 July World Youth Skills Day 15 July Social Media Giving Day 16 July World Snake Day 17 July World Emoji Day 17 July World Day for International Justice 18 July Nelson Mandela International Day 20 July National Moon Day 20 July Moon Landing Anniversary 20 July International Chess Day 21 July Guru Purnima 22 July Pi Approximation Day 22 July Chandrayaan 2 launching date 22 July National Mango Day 22 July National Flag Day 24 July Cousins Day 24 July National Thermal Engineer Day 24 July International Self Care Day 24 July Hariyali Amavasya 24 July Karkidaka Vavu 25 July National Refreshment Day (Fourth Thursday in July) 26 July Kargil Vijay Diwas 26 July Uncle and Aunt Day 27 July Parents’ Day 27 July Hariyali Teej 28 July World Nature Conservation Day 28 July World War I 28 July World Hepatitis Day 29 July National Lasagna Day 29 July International Tiger Day 29 July Nag Panchami 30 July International Friendship Day 31 July Tulsidas Jayanti

जानिए मां दुर्गा की द्वितीय शक्ति मां ब्रह्मचारिणी कथा | Maa Brahmacharini Vrat Katha

Maa Brahmacharini Vrat Katha | शारदीय नवरात्र और चैत नवरात्र के दौरान माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है. नवरात्र का दूसरा दिन देवी ब्रह्मचारिणी को समर्पित होता है। मां दुर्गा का मां ब्रह्मचारिणी स्वरूप बेहद शांत होता है। माँ ब्रह्मचारिणी का रूप कैसा होता है? माँ ब्रह्मचारिणी दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमण्डल धारण करती हैं। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा कब होती है? चैत्र नवरात्र में नवरात्र का दूसरा दिन मां दुर्गा की द्वितीय शक्ति मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप शांत और सौम्य हैं। चैत्र नवरात्र के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का विशेष महत्व है। माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से कौन सा फल प्राप्त होता है? माना जाता है कि माँ ब्रह्मचारिणी की विधिपूर्वक पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि नवरात्र के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की कथा का पाठ करने से साधक को त्याग, वैराग्य, संयम और सभी सुखों की प्राप्ति होती है। माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा के साथ ही इस दिन (Maa Brahmacharini Vrat Katha) माँ ब्रह्मचारिणी की व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी कथा | Maa Brahmacharini Vrat Katha हमारी पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ ब्रह्मचारिणी हिमालय और देवी मैना की पुत्री हैं। नारद मुनि के कहने पर माँ ब्रह्मचारिणी ने भगवान शंकर की कठिन तपस्या की थी। इसके फलस्वरूप से ही मां ब्रह्मचारिणी ने भोलेनाथ को पति के रूप में प्राप्त किया था। मां ब्रह्मचारिणी की कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की तपस्या कितनी कठिन थी? मान्यता है कि तपस्या के दौरान मां ब्रह्मचारिणी देवी ने तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए थे। मां ब्रह्मचारिणी हर तरह के दुख सहकर भी भगवान शंकर जी की आराधना करती रहीं थी। तत्पश्चात मां ब्रह्मचारिणी ने बिल्व पत्र का भी त्याग कर दिया था। इसके बाद माँ ब्रह्मचारिणी ने कई हजार वर्षों तक निर्जल व निराहार रहकर भगवान् शंकर की तपस्या की थी। जब मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान शंकर की तपस्या के दौरान पत्तों को भी खाना छोड़ा तो उनका नाम अपर्णा पड़ गया। भगवान शंकर की घोर तपस्या के कारण मां ब्रह्मचारिणी देवी का शरीर एकदम क्षीर्ण हो गया। जिसे देखकर देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताकर सराहना की और कहा कि ”हे देवी आपकी तपस्या जरूर सफल होगी”। फिर कुछ समय के बाद ऐसा ही हुआ। बता दें, मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से सर्वसिद्धि की प्राप्ति होती है।

अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस | International Day of Happiness

अंतर्राष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस क्यों मनाया जाता है? | Why International Day of Happiness Celebrated? पूरी दुनिया में प्रतिवर्ष 20 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस के रूप में मनाया जाता है. दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस का दिन खुशी, कल्याण और आनंद को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस के दिन की स्थापना वर्ष 2012 में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) द्वारा सार्वभौमिक मानव लक्ष्यों के रूप में खुशी और कल्याण के महत्व को मान्यता देते हुए की गई थी। आज इस ब्लॉग पोस्ट में, अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस के दिन हम अपनी और लोगों की खुशी की अवधारणा का महत्व और हमारे जीवन में खुशी और कल्याण पैदा करने के तरीकों को बताएँगे जिससे हमलोगों को ख़ुशी मिलती है। खुशी क्या है? | The Concept of Happiness अगर माने तब ख़ुशी एक जटिल अवधारणा है अगर माने तो ख़ुशी सबसे छोटी अवधारणा है। ख़ुशी को कई तरीकों से परिभाषित/विश्लेषित किया जा सकता है। ख़ुशी के मूल में, छोटी छोटी बातों पर खुशी और संतुष्टि को प्रदर्शित करना है। ख़ुशी किसी के जीवन से संतुष्ट महसूस करना, सकारात्मक भावनाओं का अनुभव करना और उद्देश्य और अर्थ की भावना शामिल है। खुशियाँ कई तरह होती हैं, जो इस प्रकार है: सुखमय ख़ुशी | luxurious/sensual Happiness: सुखमय ख़ुशी की अच्छा खाना, पीना, या अवकाश गतिविधियों में संलग्न होने से आनंददायक अनुभवों से प्राप्त होती है. कल्याण ख़ुशी | Well-being Happiness: कल्याण ख़ुशी प्रकार की खुशी एक उद्देश्यपूर्ण और सार्थक जीवन जीने, अपने मूल्यों और जुनून को आगे बढ़ाने और लोगों से सकारात्मक रिश्तों को बनाये रखने से प्राप्त होती है। खिलखिलाएँ खुशियाँ | Blossom Happiness: यह ख़ुशी की अवधारणा भगवान समर्पित कल्याण की स्थिति को दर्शाती है. अंतर्राष्ट्रीय ख़ुशी दिवस का महत्व : The Importance of the International Day of Happiness अंतर्राष्ट्रीय ख़ुशी दिवस कई कारणों से महत्वपूर्ण है: ख़ुशी के बारे में लोगों की जागरूकता बढ़ाना | Raising Awareness About Happiness: अंतरास्ट्रीय ख़ुशी दिवस का दिन खुशी और कल्याण के महत्व के बारे में लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाता है. अंतरास्ट्रीय ख़ुशी दिवस व्यक्तियों, संगठनों और सरकारों को इन मूल्यों को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित करता है। ख़ुशी से सकारात्मक परिवर्तन को बढ़ावा देना | Promoting Positive Change Due to Happiness: अंतरास्ट्रीय ख़ुशी दिवस का दिन व्यक्तियों और समुदायों को खुशी और खुशहाली बढ़ाने के लिए अलग अलग तरह के कार्य करने के लिए प्रोत्साहित कर लोगों को सकारात्मक बदलाव को बढ़ावा देना है। ख़ुशी के कारन वैश्विक एकता को बढ़ावा देना | Development of Global Unity due to Happiness: अंतरास्ट्रीय ख़ुशी दिवस का दिन विभिन्न संस्कृतियों, पृष्ठभूमियों और देशों के लोगों को खुशियाँ मनाने और बढ़ावा देने के लिए एक साथ लाकर वैश्विक एकता को बढ़ावा देना है। ख़ुशी और खुशहाली पैदा करने के तरीके | Ways to Cultivate Happiness and Well-being ख़ुशी और खुशहाली पैदा करने के कई तरीके और अवसर होते हैं, आइए जानते हैं कि हम कैसे अपने जीवन में ख़ुशी या खुशहाली का अवसर बना सकते हैं : कृतज्ञता का अभ्यास करना | Practicing Gratefulness जीवन में आने वाले नकारात्मक विचारों या अनुभवों पर ध्यान देने के बजाय उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करें जिनके लिए आप किसी पर आभारी हैं। शारीरिक गतिविधि में संलग्न होना | Engaging in Physical Activity: नियमित शारीरिक गतिविधि जैसे व्यायाम, टहलना, दौड़ना आपके मानसिक ऊर्जा और समग्र कल्याण को बढ़ावा देता है। सकारात्मक रिश्ते विकसित करना | Cultivating Positive Relationships: अपने परिवार, दोस्तों और जहाँ रहते हैं वह के समुदाय के लोगों के साथ सकारात्मक संबंध विकसित करें, क्योंकि सामाजिक संबंध खुशी की बहुत बड़ी कुंजी हैं। सार्थक गतिविधियाँ अपनाना | Pursuing Meaningful Activities: आप उद्देश्य और अर्थ गतिविधियों में संलग्न रहें जो आपको एक सुखद एहसास दिलाती हैं, चाहे वह स्वयंसेवा हो, रचनात्मक गतिविधियाँ हों या शौक हों। माइंडफुलनेस का अभ्यास करना | Practicing Mindfulness: आप अपना तनाव कम करने और ख़ुशी बढ़ाने के लिए, बिना किसी निर्णय के वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करें। निष्कर्ष अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस हमारे आपके जीवन में खुशी और कल्याण के महत्व का दर्शाने का उत्सव है। अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस जागरूकता बढ़ाकर, सकारात्मक बदलाव को बढ़ावा देकर और वैश्विक एकता को बढ़ावा देकर हमें खुशी और कल्याण को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित करता है। जब हम अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस के दिन को मनाते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि यह खुशी की एक यात्रा है, मंजिल नहीं है। ख़ुशी की कृतज्ञता विकसित करके, अलग अलग शारीरिक गतिविधि में संलग्न होकर, सकारात्मक रिश्तों को पोषित करके, सार्थक गतिविधियों को अपनाकर और सचेतनता का अभ्यास करके, हम अपनी खुशी और कल्याण को बढ़ा सकते हैं, और अधिक पूर्ण जीवन जी सकते हैं। तो, आइए हम इस अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस पर खुशी और खुशी फैलाएं, और अपने जीवन में खुशी और कल्याण को प्राथमिकता देने की प्रतिबद्धता बनाएं।

लड्डू होली: एक अनोखा और रंगीन उत्सव | Mathura Laddu Holi

लड्डू होली क्या है? पुरे भारतवर्ष में होली का त्योहार बहुत उत्साह और जोश के साथ मनाया जाता है। होली त्योहार रंगों, प्यार और खुशी का प्रतीक है। होली त्यौहार के दिन लोग अपने दोस्तों और परिवार के साथ मिलकर रंग खेलते हैं, गीत गाते हैं और अच्छे अच्छे पकवान कहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि होली का एक अनोखा और दूसरा रूप भी है, जिसे लड्डू होली (Laddu Holi) कहा जाता है? उत्तर प्रदेश के मथुरा और वृंदावन में लड्डू होली एक पारंपरिक होली उत्सव मनाने की परंपरा है। लड्डू होली (Laddu Holi) उत्सव होली के एक दिन पहले मनाया जाता है और इसमें शामिल लोग लड्डू के साथ होली खेलते हैं। लड्डू होली की उत्पत्ति | Laddu Holi Origin: जिस तरह सभी भारतीय त्यौहार मनाने के पीछे कोई न कोई पौराणिक घटना या परंपरा होती है उसी तरह लड्डू होली(Laddu Holi) की उत्पत्ति के पीछे एक पौराणिक कथा है। ज्ञात पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने अपने सखाओं अर्थात साथियों के साथ वृंदावन में होली खेली थी। उस समय, भगवान कृष्ण ने अपने सखाओं के साथ लड्डू के साथ होली खेली थी। यहीं से मथुरा में लड्डू होली मानाने की शुरुआत हुई थी और तभी से यह उत्सव हर साल मनाया जाता है। लड्डू होली का महत्व | Laddu Holi Significance लड्डू होली का महत्व यह है कि यह उत्सव प्यार, मजाक और खुशी का प्रतीक है। यह उत्सव लोगों को एक साथ लाता है और उन्हें अपने दोस्तों और परिवार के साथ मिलकर खुशी मनाने का अवसर प्रदान करता है। लड्डू होली का एक अनोखा पहलू यह है कि इसमें लोग लड्डू के साथ होली खेलते हैं। यह लड्डू होली को एक अनोखा और रंगीन उत्सव बनाता है। लड्डू होली का आयोजन | Laddu Holi लड्डू होली(Laddu Holi) का आयोजन मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के मथुरा और वृंदावन में किया जाता है। लड्डू होली उत्सव होली के एक दिन पहले मनाया जाता है और इसमें लोग लड्डू के साथ होली खेलते हैं। लड्डू होली के दौरान, लोग अपने घरों से निकलकर सड़कों पर आते हैं और लड्डू के साथ होली खेलते हैं। यह उत्सव एक दिन तक चलता है और इसमें स्थानीय लोग और पर्यटक दोनों हिस्सा लेते हैं। लड्डू होली के दौरान की गतिविधियां | Activity During Laddu Holi लड्डू होली के दौरान, लोग कई गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं। इन गतिविधियों में शामिल हैं: लड्डू होली का महत्व पर्यटन के लिए | Laddu Holi Tourist Attraction लड्डू होली का महत्व पर्यटन के लिए बहुत अधिक है। यह उत्सव पर्यटकों को एक अनोखा और रंगीन अनुभव प्रदान करता है।

जानिए लठमार होली क्यों और कहा खेली जाती है? | Lathmar Holi in Mathura and Vrindavan

होली का त्यौहार आते ही हमारे दिमाग में मथुरा की होली कौंधने लगाती है। और मथुरा की होली की बात हो तो लठमार होली (Lathmar Holi) की बात हमारे मन में जरूर आती है। क्या आप जानते हैं कि लठमार होली क्यों मनाई जाती है? |Why Lathmar Holi celebrated? लठमार होली(Lathmar Holi) भारत के उत्तर प्रदेश मथुरा कर वृन्दावन में मनाया जाता है, लठमार होली(Lathmar Holi) एक पारंपरिक होली उत्सव है लठमार होली(Lathmar Holi), होली(Holi Festival) का ही एक और अनोखा रूप है, जिसमें जब घर के पुरुष होली के दिन घर की महिलाओं पर रंग लगाने की कोशिश करते है तब महिलाये रंग और पानी से बचने की कोशिश करते हुए पुरषों पर लाठियों से हमला करती हैं। चूँकि महिलाएं लाठियों से हमला करतीं है इसीलिए इस होली को लठमार होली कहते हैं। लठमार होली की उत्पति कैसे हुई?| How Lathmar Holi started? भारत के मथुरा और वृन्दावन में लठमार होली(Lathmar Holi) मनाने की उत्पत्ति के पीछे एक पौराणिक कथा है, जो कि भगवान कृष्ण और राधा की प्रेम कहानी से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ वृंदावन में होली खेलने जाते थे तब राधा और अन्य गोपियां कृष्ण और उनके साथियो पर लाठियों से हमला कर देती थीं। राधा और उनकी सखियों द्वारा यह हमला प्यार और मजाक के रूप में किया जाता था। मथुरा और वृन्दावन की लठमार होली आजकल, मथुरा और वृन्दावन की लठमार होली एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है. इस लठमार होली में स्थानीय लोग और देश विदेश से आये पर्यटक दोनों मिलकर हिस्सा लेते हैं। इसमें भाग लेने वाली महिलाएं अपने पारंपरिक परिधानों में सजकर लाठियों के साथ तैयार होती हैं, जबकि पुरुष रंग और पानी के साथ तैयार होते हैं। यह उत्सव एक दिन तक चलता है और इसमें संगीत, नृत्य और रंगीन होली के साथ-साथ लाठियों की लड़ाई भी शामिल होती है। लठमार होली के दौरान, महिलाएं अपने घरों से निकलकर सड़कों पर आती हैं और पुरुषों पर लाठियों से हमला करना शुरू कर देती हैं। पुरुष उन्हें रंग और पानी से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन महिलाएं उन्हें आसानी से पकड़ लेती हैं और उन पर लाठियों से हमला करती हैं। यह लड़ाई पूरे दिन चलती है और इसमें स्थानीय लोग और पर्यटक दोनों हिस्सा लेते हैं। लठमार होली का एक अनोखा पहलू यह है कि इसमें महिलाएं पुरुषों को लाठियों से मारती हैं, लेकिन यह हमला प्यार और मजाक के रूप में सांकेतिक किया जाता है। लठमार होली का उत्सव महिलाओं को अपनी शक्ति और स्वतंत्रता का प्रदर्शन करने का अवसर प्रदान करता है।